मंगलवार, 11 मार्च 2014

हकीक पत्थर

तंत्र शास्त्र में कई विशेष प्रकार के पत्थरों का भी महत्व है। इन पत्थरों से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। हकीक एक ऐसा ही चमत्कारीक पत्थर है। हकीक का प्रयोग विभिन्न टोटकों एवं प्रयोगों में किया जाता हैतंत्र शास्त्र में हकीक को चमत्कारीक पत्थर माना गया है। यह भी कहा जाता है कि जिसके घर में हकीक होता है, वह कभी गरीब नहीं हो सकता।हकीक पत्थर का तांत्रिक क्षेत्र में बहुत महत्व है। विभिन्न टोटको एवं प्रयोगों से हकीक पत्थर लक्ष्मी का प्रतीक भी माना गया है। इसलिए कहा गया है कि जिसके घर में हकीक होता है। वह कभी दरिद्र हो नहीं सकता। हकीक पत्थर का विभिन्न पूजा-पाठ, साधनाओं और उपासनाओं में प्रयोग किए जा सकते हैं।किसी शुक्रवार के दिन रात्रि में पूजा उपासना करने के पश्चात एक हकीक माला लें और एक सौ आठ बार ऊँ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद माला को लक्ष्मीजी के मंदिर में अर्पित कर दें। धन से जुड़ी हर समस्या हल हो जाएगी।यदि ग्यारह हकीक पत्थर लेकर किसी मंदिर में चढ़ा दें और ऐसा कहें कि अमुक कार्य में विजय होना चाहता हूं तो निश्चय ही उस कार्य में विजय प्राप्त होती है।जो व्यक्ति श्रेष्ठ धन की इच्छा रखते हैं वह रात में 27 हकीक पत्थर लेकर उसके ऊपर लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें, तो निश्चय ही उसके घर में अधिक उन्नति होती है . इस तरह यह पत्थर धन से जुड़ी आपकी हर समस्या का हल कर देता है।
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सोमवार, 10 मार्च 2014

                                             
                   राशि पर ग्रह का प्रभाव 

सूर्य ग्रह का प्रभाव :-   सूर्य पृथ्वी से करीब 110 गुना बड़ा है। और इसकी दुरी लगभग नो क्रॉस सत्तर लाख                                       मिल है। पृथ्वी तक इसकी किरणे करीब 8 मिनट में पहुँचती है। सूर्य एक राशि पर एक माह रहता है। सौर मंडल के भ्रमण में ऐसे 365 दिन छह धण्टे का समय लगता है। यह पुरुष ग्रह है। इसकी जाती क्षत्रिय है। और यह पूर्व दिशा का स्वामी है। यह हमेशा मार्गी तथा उदित रहने वाला ग्रह है। यह अमाशय पर रहता है। और पेट कि बीमारियो का परिचायक है। यह उत्तरा फाल्गुनी और उत्तराषाढ़ व् कृतिका इसके नक्षत्र है।
                सूर्य सिंह राशि का स्वामी है। मेष राशि में यह उच्च रहता है और तुला राशि में यह नीचे का होता है। इसका मित्र राशि है। -वृशिचक, धनु , कर्क और मं है।
इसका शत्रु राशि है। -वृष ,मकर और कुंभ है।
सूर्य अपने भाव से सातवे भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। विवाह,यात्रा ,मांगलिक कार्यो और व्यापर के लिए सूर्य का विशेष अध्ययन होता है। सूर्य की महादशा छह वर्ष कि होता है।

चंद्रमा ग्रह का प्रभाव :-  चंद्रमा को मन का कारक मन जाता हेय़्ह पृथ्वी  सबसे टिकट है। यह 2180 मिल प्रति                                      घंटे कि गति से चलता है। यह सदा मार्गी और उदित ग्रह है। यह कर्क राशि का स्वामी है। एक राशि पर दो चौथाई दिन रहता है। वृष राशि में उच्च का और वृश्चिक राशि में निचे का स्थान होताहे।
                      अपने भाव से सातवे भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।  लिंग -स्त्री ,जाति -वैश्य और स्वभाव -चर है। जन्म कुंडली में चंद्रमा का सबसे ज्यादा महत्व है। यह जातक को शीघ्र लाभ - हानि पहुँचने कि क्षमता। रखता है मेष ,तुला ,वृश्चिक और मं लग्नो में चंद्रमा का योग होता है। चंद्रमा कि महादशा दस वर्ष कि होती है।

मंगल ग्रह का प्रभाव :-  पृथ्वी से मंगल कि दुरी करीब 6. 25 करोड़ मिल है। इसकी गति में परिर्तन होता है।                                           सूर्य के नजदीक पहुँचने पर इसकी गति तेज हो।  इस कारण यह  वक्री होता है तो कभी मार्गी होता है। मंगल को पराक्रम और साहस का प्रतीक गया है। ग्रहो में इसे सेनापति का दर्जा दिया गया है। यह मेष एंव वृश्चिक राशियों का स्वामी है। मकर राशि में उच्च और कर्क राशि में निचे का होता है। मंगल -पुरुष ग्रह ,तत्व अग्नि का कारक है। धनु और मीन राशि का मित्र है। कन्या और मिथुन राशि का शत्रु है। सूर्य के साथ व्यवहार अच्छा रखता है। और बुध को शत्रु मानता है। इसकी महादशा 7 वर्ष कि होती है।

बुध ग्रह का प्रभाव :- सौर मंडल का यह सबसे छोटा ग्रह है। इसकी दुरी करीब 3.68 करोड़मील है। यह कभी                                        वक्री तो कभी मार्गी  होता है। एक राशि को पार करने में ऐसे 25 -26 दिन लगते है। ग्रहो में इसे राजकुमार का पद दिया है। इसे नपुंसक ग्रह मन गया है। यह उत्तर दिशा का मालिक है। और यह मिथुन , कन्या राशि का स्वामी है। वृष , तुला व् सिंह राशि का मित्र  है। कर्क इसका शत्रु है। और चंद्रमा के साथ शत्रुवत व्यवहार करता है। और यह व्यापर का भी कारक है। इसकी महादशा 17 वर्ष कि होता है।

बृहस्पती ग्रह का प्रभाव :- यह पृथ्वी से करीब 37 करोड़ मील कि दुरी पर है। सूर्य कि परिक्रमा 12 वर्ष में पूर्ण करता है। यह एक राशि पर एक वर्ष रहता है। बड़े आकर के कारण इसे गुरु का नाम दिया गया है। ग्रहो में इसे मंत्री का पद दिया गया है। धनु और मीन राशि का यह स्वामी है। कर्क राशि में यह उच्च स्थान पर है। मकर राशि मे यह निचे स्थान पर है। इसकी मित्र रशिया है  - मेष , सिंह ,कन्या और वृश्चिक है। तथा शत्रु राशि है  वर्ष , मिथुन और तुला है। यह कभी -2 वक्री व् माग्री होता है। इसकी महादशा 16 वर्ष कि होती है।

शुक्र ग्रह का प्रभाव :- पृथ्वी से शुक्र कि दुरी करीब साडे तीन करोड़ मील मणि गई है। वर्ष में एक बार पृथ्वी के निकट आती है। सूर्य कि परिक्रमा 225 दिनों में पूर्ण क्र लेता है। ग्रह मंडल में इसे मंत्री का पद प्राप्त है। यह स्त्री ग्रह है। यह तुला और वर्ष राशि के स्वामी के स्वामी है। मं उच्च राशि है। तथा कन्या नीची राशि है। शुक्र कि मित्रता धनु ,मकर और शत्रुता - कर्क और सिंह से है। यह सूर्य और मंगल के साथ भी शत्रुता रखता है। शुक्र कि महादशा बीस वर्ष कि होती है।

शनि ग्रह का प्रभाव :-  शनि ग्रह पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूर है। और एक राशि पर यह करीब ढाई साल रहता है। इस ग्रह कि गति बहुत धीमी है। तथा शनैश्चर भी कहते है। इसका लिंग -नपुंसक , जाति -शुद्र , दिशा - पश्चिम है। तिल राशि में उच्च तथा मेष राशि में निचे है। अपने भाव से तीसरे , सातवे भाव पर दृस्टि से देखता है। वृष , मिथुन इसके मित्र व् कर्क , सिंह और वृश्चिक शत्रु रशिया है। चंदमा के साथ भी शत्रुता व्यवहार  है। मार्गी, वक्री दोनों होते है। तुला राशि के लगन में योगकारक होता है। शनि कि महादशा 19 वर्ष तक कि होती है।